रसायन विज्ञान प्रमुख शब्दकोश भाग - 7, - Study Search Point

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रसायन विज्ञान प्रमुख शब्दकोश भाग - 7,

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जल किसे कहते है ?
जल या पानी एक आम रासायनिक पदार्थ है जिसका अणु दो हाइड्रोजन परमाणु और एक ऑक्सीजन परमाणु से बना है - H2O। यह सारे प्राणियों के जीवन का आधार है। आमतौर पर जल शब्द का प्प्रयोग द्रव अवस्था के लिए उपयोग में लाया जाता है पर यह ठोस अवस्था (बर्फ) और गैसीय अवस्था (भाप या जल वाष्प) में भी पाया जाता है। पानी जल-आत्मीय सतहों पर तरल-क्रिस्टल के रूप में भी पाया जाता है।
पृथ्वी का लगभग 71% सतह को 1.460 पीटा टन (पीटी) (1021 किलोग्राम) जल से आच्छदित है जो अधिकतर महासागरों और अन्य बड़े जल निकायों का हिस्सा होता है इसके अतिरिक्त, 1.6% भूमिगत जल एक्वीफर और 0.001% जल वाष्प और बादल (इनका गठन हवा मे जल के निलंबित ठोस और द्रव कणों से होता है) के रूप मे पाया जाता है। खारे जल के महासागरों मे पृथ्वी का कुल 97%, हिमनदों और ध्रुवीय बर्फ चोटिओं मे 2.4% और अन्य स्रोतों जैसे नदियों, झीलों और तालाबों मे 0.6% जल पाया जाता है। पृथ्वी पर जल की एक बहुत छोटी मात्रा, पानी की टंकिओं, जैविक निकायों, विनिर्मित उत्पादों के भीतर और खाद्य भंडार मे निहित है। बर्फीली चोटिओं, हिमनद, एक्वीफर या झीलों का जल कई बार धरती पर जीवन के लिए साफ जल उपलब्ध कराता है। जल लगातार एक चक्र मे घूमता रहता है जिसे जलचक्र कहते है, इसमे वाष्पीकरण या ट्रांस्पिरेशन, वर्षा और बह कर सागर मे पहँचना शामिल है। हवा जल वाष्प को स्थल के उपर उसी दर से उड़ा ले जाती है जिस गति से यह बहकर सागर मे पहँचता है लगभग 36 Tt (1012किलोग्राम) प्रति वर्ष। भूमि पर 107 Tt वर्षा के अलावा, वाष्पीकरण 71 Tt प्रति वर्ष का अतिरिक्त योगदान देता है। साफ और ताजा पेयजल मानवीय और अन्य जीवन के लिए आवश्यक है, लेकिन दुनिया के कई भागों में खासकर विकासशील देशों मे भयंकरजलसंकट है और अनुमान है कि 2025 तक विश्व की आधी जनसंख्या इस जलसंकट से दो-चार होगी। जल विश्व अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, क्योकि यह रासायनिक पदार्थों की एक विस्तृत श्रृंखला के लिए विलायक के रूप में कार्य करता है और औद्योगिक प्रशीतन और परिवहन को सुगम बनाता है। मीठे जल की लगभग 70% मात्रा की खपत कृषि मे होती है।

विस्फोटक किसे कहते है ?
विस्फोटक (explosives) कुछ यौगिक या मिश्रण ऐसे होते हैं जिनमें आग लगाने पर या अघात करने पर बड़े धमाके के साथ वे विस्फुटित होते हैं। धमाके का कारण बड़े अल्प काल में बहुत बड़ी मात्रा में गैसों का बनना होता है। ऐसे पदार्थों को "विस्फोटक" कहते हैं। आज बहुत बड़ी मात्रा में विस्फोटकों का निर्माण होता है।
विस्फोटक रासायनिक पदार्थ का मिश्रण होता है, जिसे हथौड़े से आघात करने या ज्वाला से छूने, या विद्युत् स्फुलिंग से एकाएक ऊष्मा के विकास के साथ बहुत बड़ी मात्रा में गैस बनने के कारण विस्फोटन होता है। यदि किसी बंद कक्ष में विस्फोटन हो, तो कक्ष की दीवारें छिन्न भिन्न हो जाती है। पर लाभकारी विस्फोटक अपेक्षया निष्क्रिय होते हैं, ताकि उनका निर्माण और परिवहन निरापद हो सके। कुछ विस्फोटक ऐसे होते हैं कि पंख से छूने पर भी वे विस्फुटित हो जाते हैं। ऐसे विस्फोटक किसी उपयोगी काम के नहीं होते। उपयोगी विस्फोटकों में कुछ उच्च विस्फोटक होते हैं और कुछ सामान्य या मंद विस्फोटक। यह विभेद उनकी सुग्राहिता के आधार पर नहीं किया जाता, वरन् उनके छिन्न भिन्न करने की क्षमता पर किया जाता है। कुछ विस्फोटक, जैसे मर्करी फल्मिनेट तथा लेड ऐज़ाइड (Lead azide), जो बड़े सुग्राही होते हैं, प्राथमिक विस्फोटक के रूप में न्यून सुग्राही विस्फोटक के विस्फोटन में उपयुक्त होते हैं। कुछ प्रमुख विस्फोटक ये हैं:
1. डायनामाइट - तीव्र विस्फोटक, शांतिकाल के लिए
2. विस्फोटक जिलेटिन - तीव्र विस्फोटक, शांतिकाल के लिए
3. टीएनटी (TNT) - तीव्र विस्फोटक, युद्ध के लिए
4. पिक्रिक अम्ल - तीव्र विस्फोटक युद्ध के लिए
5. अमोनियम नाइट्रेट - तीव्र विस्फोटक युद्ध के लिए
6. धूमहीन चूर्ण - मंद विस्फोटक, युद्ध के लिए
7. कालाचूर्ण या बारूद - मंद विस्फोटक, शांति और युद्ध दोनों के लिए
8. मर्करी फल्मिनेट - सहायक विस्फोटक, युद्ध के लिए
9. लेड ऐज़ाइड - सहायक विस्फोटक, युद्ध के लिए

केरोसीन किसे कहते है ?
केरोसीन (मिट्टी का तेल) एक तरल खनिज है जिसका मुख्य उपयोग दीप, स्टोव और ट्रैक्टरों में जलाने में होता है। इस काम के लिये तेल की श्यानता कम, दमकांक ऊँचा, रंग साफ और हल्का, जलने पर दुर्गंध और धुआँ देनेवाले पदार्थों का अभाव रहना चाहिए। औषधियों में विलायक के रूप में, उद्योग धंधों में, प्राकृतिक गैस से पैट्रोल निकालने में तथा अवशोषक तेल के रूप में भी इसका व्यवहार होता है। केरोसीन कच्चे पेट्रोलियम का वह अंश है जो 175-275 सें. ताप पर आसुत होता है। इसका विशिष्ट गुरुत्व 0.775 से लेकर 0.850 तक होता है। इसमें पैराफिन, नैफ्थीन और सौरभिक हाइड्रोकार्बन रहता है। इसका भौतिक और रासायनिक गुणउपस्थित हाइड्रोकार्बनों के अनुपात, संघटन और क्वथनांक पर निर्भर करता है। इसका दमकांक (flash point) 24 से लेकर 66 सें. तक के बीच है। इसका रंग हल्का हरा या पीला से लेकर जल सा स्वच्छ हो सकता है। कच्चे केरोसीन में सौरभिक हाइड्रोकार्बन (40 प्रतिशत तक) आक्सिजन, गंधक और नाइट्रोजन के कुछ यौगिक रहते हैं। ऐसे तेल की सफाई पहले सल्फ्यूरिक अम्ल के उपचार से, फिर सोडा विलयन और जल से धोकर की जाती है। धोने के बाद या तो फुलर मिट्टी पर छानते अथवा पुन: आसवन करते हैं। इससे अनेक अनावश्यक पदार्थ, फीनोल आदि आक्सि यौगिक, सौरभिक और असंतृप्त हाइड्रोकार्बन, गंधक के यौगिक इत्यादि निकल जाते हैं। उपचार के बाद भली-भांति धोना बड़ा आवश्यक है नहीं तो लालटेन की बत्ती या बर्नर पर निक्षेप बैठ सकता है। सौरभिक और चक्रीय हाइड्रोकार्बन (नैफ़थीन) भली भाँति पृथक् न होने पर बत्ती पर कजली जम सकती है।
तेल के तनाव और श्यानता पर जलने का गुण निर्भर करता है। जब तेल अधिक श्यान होता है तब वह बत्ती में अधिक उठता नहीं और लौ छोटी होती है। जलने पर तेल का अधिक भाग जलकर ऊँचा ताप उत्पन्न करता है तथा कुछ भाग का भंजन होकर गैसीय हाइड्रोकार्बन और कोक बनाते हैं। कोक से फिर दहनशील गैसें बनकर जलती हैं। कुछ को तापदीप्त होकर प्रकाश उत्पन्न करता और फिर अंत में जलकर डाइआक्साइड बनता है।

हाइड्रोकार्बन किसे कहते है ?
हाइड्रोकार्बन कार्बनिक यौगिक होते हैं जो हाइड्रोजन और कार्बन के परमाणुओं से मिलकर बने होते हैं। इनका मुख्य स्रोत भूतैल है। प्राकृतिक गैस में भी केवल हाइड्रोकार्बन पाए जाते हैं। हाइड्रोकार्बन संतृप्त तथा असंतृप्त दो प्रकार के होते हैं। इसका मुख्य स्रोत जीवधारी व पेट्रोलियम हैं। हाइड्रोकार्बन प्रत्यक्ष रूप से कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्ल इत्यादि के रूप में जीवन के आधार हैं। अधिकतर औषधियाँ, कृषि रसायन, ईंधन तथा प्लास्टिक भी हाइड्रोजन  कार्बन से बने यौगिक होते हैं।
हाइड्रोकार्बन को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है-
  1. संतृप्त हाइड्रोकार्बन - ऐसे हाइड्रोकार्बन, जिनके परमाणु परस्पर केवल एक आबंध द्वारा जुड़े होते हैं, जैसे- ब्यूटेन (CH3-CH2-CH2-CH3)
  2. असंतृप्त हाइड्रोकार्बन - ऐसे हाइड्रोकार्बन, जो बहु-आबंध से जुड़े होते हैं, जैसे- बेंजीन (C6H6)

बेंज़ोइक अम्ल किसे कहते है ?
बेंज़ोइक अम्ल (Benzoic Acid) ऐरोमेटिक कार्बोक्सिलिक अम्ल है। यह हलके, रंगहीन, चमकदार, क्रिस्टलीय चूर्ण के रूप में प्राप्य है। इसका सूत्र (C6H5 COOH), गलनांक 122.4 डिग्री सें. और क्वथनांक 250 डिग्री सें. है। इसका अधिक महत्व का उपयोग खाद्य पदार्थों के परिरक्षण में है। चटनियों, अचार, मुरब्बे, फल फूलों के रस, शरबत आदि तथा डिब्बे और बोतलां में बंद परिरक्षित आहारों को सड़ने, किण्वन और खराब होने से बचाने के लिए उनके साथ थोड़ी मात्रा में सोडियम बेंज़ोएट डाला जाता है और इसके इस उपयोग में वैधानिक आपत्ति भी नहीं है। जल में अल्प विलेय, किंतु ईथर और ऐल्कोहॉल में अपेक्षाकृत सुगमता से विलेय है। बेंज़ोइक अम्ल प्रकृति में स्वतंत्र रूप से, या संयुक्त अवस्था में लोबान (Gum benzoin) में और कई प्रकार के बाल्समों में पाया जाता है। औद्योगिक स्तर पर व्यापारिक बेंज़ोइक अम्ल का निर्माण अनेक विधियों से किया जाता है, जैसे
(1) बेंजों-ट्राइक्लोराइड (C6H5. CCI3) के जलविश्लेषण से, जिसमें लोहचूर्ण और चूना उत्प्रेरक के रूप में प्रयुक्त होते हैं,
(2) भाप और जिंक ऑक्साइड की उपस्थिति में थैलिक ऐनहाइड्राइड से थैलिक अम्ल बनाकर, उसका डीकार्बोक्सिलेशन से तथा
(3) मैंगनीज़ डाइऑक्साइड एवं सल्फ्यूरिक अम्ल से, या कोबाल्ट उत्प्रेरक के समक्ष हवा से, टॉलूईन के ऑक्सीकरण से।
इस अम्ल की रासायनिक सक्रियता अपेक्षाकृत कम होने के कारण रासायनिक संश्लेषण में उसकी उपादेयता सीमित है। इसके सीधे (प्रत्यक्ष) क्लोरीकरण से पैरा-क्लोरोबज़ोइक अम्ल और अल्प मात्रा में 2, 5- और 3, 4- डाइक्लोरो बेंज़ोइक अम्ल बनाए जाते हैं। सल्फ्यूरिक और नाइट्रिक अम्लों के मिश्रण द्वारा सीधा नाइट्रेशन करने से साधारण ताप पर मेटा-नाइट्रो-बेंज़ोइक अम्ल और ऊँचे ताप पर 3, 5- डाइनाइट्रोबेंज़ोइक अम्ल बनते हैं।

ब्यूटेन किसे कहते है ?
ब्यूटेन एक हाइड्रोकार्बन है। यह एक अल्केन है। जिसका रासायनिक सूत्र C4H10 है। नार्मल ब्यूटेन तथा आइसो ब्यूटेन का द्रवीभूत किया हुआ मिश्रण एल.पी.जी.' (द्रवित पेट्रोलियम गैस) कहते हैं। यह ब्यूटेन एवं प्रओमेन का मिश्रण होता है, जिसे उच्च दाव पर द्रवित कर सिलेण्डरों में भर लिया जाता है।

डीज़ल किसे कहते है ?
डीज़ल एक प्रकार का उदप्रांगार ईंधन है जो पेट्रोलियम को कई चरणों में ठंडा करने से एक चरण (200-350 C) में बनता है। इसका उपयोग वाहनों, मशीनों, संयत्रों आदि को चलाने के लिए ईंधन के रुप मे किया जाता है। इसका प्रयोग भारी वाहनों तथा तापज्वलित यानि संपीडित वायु में उड़ेलने से हुए स्वतः दहन इंजनों में इस्तेमाल होता है। प्रति लीटर इसमें पेट्रोल के बराबर रासायनिक ऊर्जा होती है। इसके द्वारा चालित इंजनों में नाट्रोजन आक्साईड तथा कालिख के कण अधिक होते हैं, जिसकी वजह से प्रदूषण को नियंत्रित करना मुश्किल होता है। इसलिए इसके स्थान पर जैविक पदार्थों से बने तेल, जिन्हें जैव डीज़ल कहा जाता है, का इस्तेमाल शुरु हुआ है। डीज़ल शब्द का इस्तेमाल इस विस्थापित तेल के लिए भी होता है।
भारत में इस पर पेट्रोल के मुकाबले कम कर लिया जाता है जिसकी वजह से ये पेट्रोल से सस्ता होता है। इसके विपरीत कई देशों में इसके इस्तेमाल को कम करने के उद्देश्य से अधिक कर लगाया जाता है। इसका नाम जर्मन आविष्कारक रुडोल्फ़ डीज़ल के नाम पर पड़ा है जिसने 1892 में डीज़ल इंजन लिए पेटेंट लिया।

मिथेन किसे कहते है ?
मिथेन अल्केन श्रेणी का प्रथम सदस्य है। यह सबसे साधारण हाइड्रोकार्बन है। यह अल्केन श्रेणी का प्रथम सदस्य और प्राकृतिक गैस में भी शामिल रहता है। यह सबसे साधारण हाइड्रोकार्बन है, जिसका रासायनिक सूत्र CH4 है।

बेंजीन किसे कहते है ?
बेंजीन (Benzene) एक हाइड्रोकार्बन है, जिसका सूत्र C6H6 है। कोयले के शुष्क आसवन से अलकतरा तथा अलकतरे के प्रभाजी आसवन से धूपेन्य (बेंजीन) बड़ी मात्रा में तैयार होता है।
प्रदीपन गैस से प्राप्त तेल से प्रसिद्ध वैज्ञानिक फैराडे ने 1825 ई. में सर्वप्रथम बेंजीन प्राप्त किया था। मिटशरले ने 1834 ई. में बेंज़ोइक अम्ल से इसे प्राप्त किया और इसका नाम 'धूपेन्य' रखा। अलकतरे में इसकी उपस्थिति का पता पहले पहल 1845 ई. में हॉफमैन ने लगाया था। जर्मनी में बेंजीन को बेंज़ोल कहते हैं। बेंजीन प्रांगार और उदजन का एक यौगिक (हाइड्रोकार्बन) है। यह वर्णहीन और प्रबल अपवर्तक द्रव है। इसका क्वथनांक 80 डिग्री सेंटीग्रेट, ठोस बनने का ताप 5.5 डिग्री सेंटीग्रेट और घनत्व 0 डिग्री सेंटीग्रेट पर 0.899 है। इसकी गंध ऐरोमैटिक और स्वाद विशिष्ट होता है। जल में यह बड़ा अल्प विलेय, सुषव में अधिक विलेय तथा ईथर और कार्बन डाइसल्फाइड में सब अनुपातों में विलेय है। विलायक के रूप में रबड़, गोंद, वसागंधक और रेज़िन के घुलाने में प्रचुरता से प्रयुक्त होता है। जलते समय इससे धुंआँ निकलता है। रसायनत: यह सक्रिय होता है।

कैल्सियम हाइपोक्लोराइट किसे कहते है ?
कैल्सियम हाइपोक्लोराइट एक अकार्बनिक यौगिक है। इसका रासायनिक सूत्र Ca(OCl)Cl है। यह एक सफेद बेरवेदार ठोस है। इससे क्लोरीन की तीव्र गन्ध निकलती रहती है। पीने के जल के शु्द्धिकरण में इसका उपयोग किया जाता है।क्लोरोफार्म तथा क्लोरीन गैस बनाने में भी इसका उपयोग किया जाता है। इसे विरंजनचूर्ण (ब्लीचिंग पाउडर) भी कहते हैं। यह चूने का क्लोराइड होता है और देखने में चूने की तरह सफेद होता है पर इसमें क्लोरीन की गंध होती है। इसका निर्माण सर्वप्रथम ग्लैसगो के चार्ल्स टेनैंट ने सन् 1799 में किया था। विरंजन चूर्ण स्थायी नहीं होता। समय बीतने के साथ साथ इसमें क्लोरीन की मात्रा कम होती जाती है, जिससे इसके विरंजन गुण का ह्रास होता जाता है। व्यापारिक विरंजन चूर्ण में विरंजन की दृष्टि से पर्याप्त मात्रा में निष्क्रिय पदार्थ मिले रहते हैं। उच्च ताप पर यह विघटित हो जाता है। वायु की आर्द्रता और कार्बन डाइऑक्साइड से भी इसका विघटन धीरे धीरे होता है।
विरंजनचूर्ण का निर्माण चूने और क्लोरीन से होता है। बुझे चूने पर क्लोरीन की क्रिया से यह बनता है। चूने के दो से तीन इंच गहरे स्तर पर क्लोरीन गैस प्रवाहित की जाती है। चूने का यह स्तर 10 से लेकर 20 फुट चौड़े, 100 फुट लंबे और 6 से लेकर 7 फुट ऊँचे कक्ष में बना होता है और आवश्यकतानुसार समय-समय पर स्तर को उलटते रहने की व्यवस्था रहती है। क्लोरीन का अवशोषण पहले तीव्रता से होता है पर पीछे मंद पड़ जाता है। कक्ष के स्थान में अब नलों का व्यवहार होता है, जिनमें ऊपर से चूना गिरता है और नीचे से क्लोरीन प्रविष्ट करता है और दोनों नलों के मध्य चूने द्वारा क्लोरीन के अवशोषण से तत्काल चूर्ण प्राप्त होता है।
कैल्सियम प्रक्रम द्वारा निर्माण
Ca(OH)2 + 2 Cl2 → Ca(ClO)2 + CaCl2 + 2 H2O
सोडियम प्रक्रम द्वारा निर्माण
Ca(OH)2 + 3 Cl2 + 2 NaOH → Ca(ClO)2 + CaCl2 + 2 H2O + 2 NaCl

लैक्टिक अम्ल किसे कहते है ?
लैक्टिक अम्ल (Lactic acid) विभिन्न जैवरासायनिक प्रक्रमों में प्रमुख भूमिका निभाने वाला एक रासायनिक यौगिक है। इसे सर्वप्रथम स्वीडेन के रसायनविज्ञानी कार्ल विल्हेल्म शीले ने 1780 में विलगित (isolate) किया था। लैक्टिक अम्ल एक कार्बोक्सिलिक अम्ल है जिसका अणुसूत्र C3H6O3 है।  हमें थकान का अनुभव उस समय होता है, जब मांसपेशियों में लैक्टिक अम्ल एकत्र होने लगता है।

यूरिया किसे कहते है ?
यूरिया एक कार्बनिक यौगिक है जिसका रासायनिक सूत्र (NH)2CO होता है। कार्बनिक रसायन के क्षेत्र में इसे कार्बामाइड भी कहा जाता है। यह एक रंगहीन, गन्धहीन, सफेद, रवेदार जहरीला ठोस पदार्थ है। यह जल में अति विलेय है। यह स्तनपायी और सरीसृप प्राणियों के मूत्र में पाया जाता है। कृषि में नाइट्रोजनयुक्त रासायनिक खाद के रूप में इसका उपयोग होता है। यूरिया को सर्वप्रथम 1773 में मूत्र में फ्रेंच वैज्ञानिक हिलेरी राउले ने खोजा था परन्तु कृत्रिम विधि से सबसे पहले यूरिया बनाने का श्रेय जर्मन वैज्ञानिर वोहलर को जाता है। इन्होंने सिल्वर आइसोसाइनेट से यूरिया का निर्माण किया तथा स्वीडेन के वैज्ञानिक बर्जेलियस के एक पत्र लिखा कि मैंने बिना वृक्क (किडनी) की सहायता लिए कृत्रिम विधि से यूरिया बना लिया है। उस समय पूरी दुनिया में बर्जेलियस का सिद्धान्त माना जाता था कि यूरिया जैसे कार्बनिक यौगिक सजीवों के शरीर के बाहर बन ही नहीं सकते तथा इनको बनाने के लिए प्राण शक्ति की आवश्यकता होती है।
AgNCO (सिल्वर आइसोसाइनेट) + NH4Cl → (NH2)2CO (यूरिया) + AgCl
बड़े पैमाने पर यूरिया का उत्पादन द्रव अमोनिया तथा द्रव कार्बन डाई-आक्साइड की प्रतिक्रिया से होता है। यूरिया का उपयोग मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाने में होता है। इसका प्रयोग वाहनों के प्रदूषण नियंत्रक के रूप में भी किया जाता है। यूरिया-फार्मल्डिहाइड, रेंजिन, प्लास्टिक एवं हाइड्राजिन बनाने में इसका उपयोग किया जाता है। इससे यूरिया-स्टीबामिन नामक काला-जार की दवा बनती है। वेरोनल नामक नींद की दवा बनाने में उसका उपयोग किया जाता है। सेडेटिव के रूप में उपयोग होने वाली दवाओं के बनाने में भी इसका उपयोग किया जाता है।

सिलिका किसे कहते है ?
सिलिका या सिलिकॉन डाईऑक्साइड (Silica, SiO2), खनिज सिलिकन और ऑक्सीजन के योग से बना है। यह निम्नलिखित खनिजों के रूप में मिलता है! सिलिका का उपयोग भिन्न-भिन्न रूपों में होता है। बालू में विद्यमान छोटे-छोटे कण काँच तथा धात्विक उद्योगों, विशेषत: भट्ठियों के निर्माण में काम आते हैं। सिरेमिक सामानों के निर्माण में सिलिका काम आता है। तापरोधी ईंटें इससे बनती हैं। ताप परिवर्तन को यह सरलता से पूरक के रूप में सहन कर लेता है। यह खनिज, रंग तथा कागज उद्योग में काम आता है। शुद्ध, रंगहीन, क्वार्ट्ज क्रिस्टल से प्रकाशयंत्र तथा रासायनिक उपकरण बनाए जाते हैं। सिलिका से बनी बालू शिलाएँ मकान बनाने के पत्थरों के रूप में प्रयोग की जाती हैं।
  1. क्रिस्टलीय: जैसे क्वार्ट्ज
  2. गुप्त क्रिस्टलीय: जैसे चाल्सीडानी, ऐगेट और फ्लिंट
  3. अक्रिस्टली : जैसे ओपल।

शक्कर किसे कहते है ?
शक्करशर्करा या चीनी (Sugar) एक क्रिस्टलीय खाद्य पदार्थ है। इसमें मुख्यत: सुक्रोजलैक्टोज एवं फ्रक्टोज उपस्थित होता है। मानव की स्वाद ग्रन्थियाँ मस्तिष्क को इसका स्वाद मीठा बताती हैं। चीनी मुख्यत: गन्ना (या ईख) एवं चुकन्दर से तैयार की जाती है। यह फलोंमधु एवं अन्य कई स्रोतों में भी पायी जाती है। इसे मारवाडी भाषा मेँ 'खोड' अथवा ' मुरस ' कहा जाता है| चीनी की अत्यधिक मात्रा खाने से प्रकार-२ का मधुमेह होने की घटनाएँ अधिक देखी गयीं हैं। इसके अलावा मोटापा और दाँतों का क्षरण भी होता है। विश्व में ब्राजील में प्रति व्यक्ति चीनी की खपत सर्वाधिक होती है। भारतमें एक देश के रूप में सर्वाधिक चीनी का खपत होती है।

नमक 
किसे कहते है ?
नमक (Common Salt) से साधारणतया भोजन में प्रयुक्त होने वाले नमक का बोध होता है। रासायनिक दृष्टि से यह सोडियम क्लोराइड (NaCl) है जिसका क्रिस्टल पारदर्शक एवं घनाकार होता है। शुद्ध नमक रंगहीन होता है, किंतु लोहमय अपद्रव्यों के कारण इसका रंग पीला या लाल हो जाता है। समुद्र के खारापन के लिये उसमें मुख्यत: सोडियम क्लोराइड की उपस्थिति कारण होती है।भौमिकी में लवण को हैलाइट (Halite) कहते हैं। शुद्ध नमक रंगहीन होता है, किंतु लोहमय अपद्रव्यों के कारण इसका रंग पीला या लाल हो जाता है। इसका द्रवणांक 804 डिग्री सें., आपेक्षिक घनत्व 2.16, अपवर्तनांक 10.542 तथा कठोरता 2.5 है। यह ठंडे जल में सुगमता से घुल जाता है और गरम जल में इसकी विलेयता कुछ बढ़ जाती है। हिम के साथ नमक को मिला देने से मिश्रण का ताप -21 डिग्री सें. तक गिर सकता है।सन् 1947 के पूर्व भारत में नमक का प्रधान स्रोत लवणश्रेणी (Salt Range) थी। खैबर (पाकिस्तान) में नमक की विशाल खानें हैं। यहाँ नमक की तह की मोटाई 100 फुट से भी अधिक है। यह नमक इतना अधिक वर्णहीन एवं पारदर्शक है कि यदि नमक की 10 फुट मोटी दीवाल के एक ओर प्रकाशपुंज रखा जाए तो दूसरी ओर कोई भी व्यक्ति सरलता से पढ़ सकता है। इस नमक निक्षेप पर पर्याप्त लंबे समय से खननकार्य होता चला आ रहा है। यहाँ नमक के खाननकार्य के समय एक प्रकार की धूल (Salt dust) विपुल मात्रा में बनती है। यह लवणीय धूल इंपीरियल केमिकल इंडस्ट्रीज द्वारा संचित की जाती है जो इसका उपयोग क्षारीय संयत्र (Alkali plant) में करते हैं। इस क्षेत्र से नमक के उत्पादन की मात्रा भारत विभाजन के पूर्व 1,87,490 टन था। खैबर नमक की शुद्धता 90 प्रतिशत से भी अधिक है। इसके अतिरिक्त अनेक स्थान और भी हैं जहाँ नमक के समृद्ध स्तर प्राप्त हुए हैं। ऐसा ही एक स्थान वाछी तथा दूसरा कोहर है। यहाँ पर नमक के अतिरिक्त पोटासियम क्लोराइड भी कुछ अंशों में विद्यमान है। 
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